भारत में कोरोना संक्रमण का फैलाव मुख्यतः सुपर स्प्रेडरों से हुआ है। सुपर स्प्रेडर ऐसे संक्रमितों को कहा जाता है जिनके संपर्क में आने से बड़ी संख्या में लोग संक्रमित हुए हैं। यह जानकारी देश में हुई अब तक की सबसे बड़ी कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग स्टडी से सामने आई है।

इस स्टडी में आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के 5,75,071 लोगों को शामिल किया गया। इसमें 84,965 कन्फर्म केस हैं। स्टडी में इन लोगों के लाखों कॉन्टैक्ट से भी संपर्क किया गया। रिसर्च में पाया गया कि देश के करीब 70% संक्रमितों ने अपने किसी भी संपर्क तक यह वायरस नहीं फैलाया। वहीं, 8% संक्रमित लोग कुल 60% नए संक्रमण का कारण बने।

साइंस जर्नल में छपी इस स्टडी में पाया गया कि जिन लोगों ने जान गंवाई उनमें से 63% पहले से किसी अन्य बीमारी से ग्रस्त थे। वहीं, 36% को पहले से दो या अधिक गंभीर बीमारी थी। जान गंवाने वाले 46% लोग डायबिटिक थे। अस्पताल में जिन लोगों ने जान गंवाई वे मौत से पहले औसतन पांच दिन अस्पताल में रहे। अमेरिका में यह आंकड़ा 13 दिनों का है।

विकसित देशों से अलग है ट्रेंड

रिसर्च में शामिल रहे सेंटर फॉर डिजीज डायनामिक्स, इकोनॉमिक्स एंड पॉलिसी, नई दिल्ली के वैज्ञानिक रमणन लक्ष्मीनारायण के मुताबिक भारत का ट्रेंड विकसित देशों के ट्रेंड से अलग है। विकसित देशों में संक्रमितों और मृतकों में सबसे ज्यादा संख्या बुजुर्गों की रही है। लेकिन आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में 40 से 69 साल के लोग सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं।

स्टडी में यह भी पाया गया कि एक समान उम्र के कॉन्टैक्ट में संक्रमण का खतरा ज्यादा रहा है। 0-14 साल के बच्चों में यह सबसे ज्यादा देखने को मिला। इसके बाद 65 से ऊपर लोगों का नंबर आता है। कोरोना के कारण मौत (केस फैटेलिटी रेशियो) 5-17 साल के लोगों में 0.05% रही। वहीं, 85 साल से अधिक के लोगों में यह 16.6% है।

जेनेटिक म्यूटेशन के चलते मृत्यु दर का आंकड़ा भी अलग-अलग

भारत की विशाल आबादी में क्षेत्रवार अलग-अलग तरह के जेनेटिक म्यूटेशन हुए हैं। इसके चलते महामारी के कारण देश के विभिन्न हिस्सों में मृत्यु दर का आंकड़ा भी अलग-अलग आ रहा है। यह जानकारी बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (बीएचयू) के रिसर्चर्स की अगुवाई वाली एक अंतरराष्ट्रीय टीम की स्टडी से सामने आई है।

इस स्टडी में हमारी कोशिकाओं की सतह पर पाए जाने वाले उस प्रोटीन का अध्ययन किया गया है जिसे कोरोनावायरस के शरीर में प्रवेश का गेट-वे कहा जाता है। इसे एंजियोटेन्सिन कन्वर्टिंग एंजाइम 2 (एसीई2) कहा जाता है। एसीई2 एक जीन के द्वारा संचालित होता है जो एक्स क्रोमोजोम पर पाया जाता है। रिसर्चर्स ने इस जीन में होने वाले म्यूटेशन (जिसे आरएस2285666 हेप्लोटाइप कहा जाता है) का भारत के अलग-अलग राज्यों में अध्ययन किया।

रिसर्चर्स ने पाया कि इस म्यूटेशन की फ्रिक्वेंसी भारत के राज्यों में 33 से 100% तक है। जहां यह प्रतिशत ज्यादा है वहां कोरोनावायरस के कारण कम मौत हो रही है। बीएचयू के जीव विज्ञान विभाग के प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे ने कहा कि यह म्यूटेशन लोगों में कोरोनावायरस के खतरे को कम करता है। उन्होंने बताया कि जिस क्षेत्र में ज्यादा लोगों में यह म्यूटेशन होगा वहां कोरोना के संक्रमण की क्षमता कम होगी।

हर क्षेत्र के लिए एक ही रणनीति सही नहीं

स्टडी में यह निष्कर्ष भी निकला कि कोरोना महामारी से जंग के लिए हर क्षेत्र के लिए एक ही रणनीति अपनाना सही उपाय नहीं है। दुनिया की अलग-अलग आबादी समूह में इस वायरस के ट्रांसमिशन का पैटर्न अलग-अलग है। रिसर्च टीम की सदस्य अंशिका श्रीवास्तव ने बताया कि भारत और बांग्लादेश के जनजातीय (ट्राइबल) आबादी में यह म्यूटेशन जातीय (कास्ट) आबादी की तुलना में ज्यादा है।

पूर्वी एशियाई आबादी के करीब हैं भारतीय

प्रोफेसर चौबे ने कहा कि इस म्यूटेशन के मामले में भारतीय पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी एशियाई आबादी के ज्यादा करीब हैं। हालांकि, जेनेटिक और शारीरिक बनावट के आधार पर आमतौर पर भारतीयों को यूरोपियन आबादी के करीब माना जाता रहा है। यूरोपियन आबादी में यह म्युटेशन सिर्फ 20% है। पूर्वी और दक्षिण पूर्वी एशियाई आबादी में यह म्यूटेशन भारतीयों से कुछ ज्यादा है।



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साइंस जर्नल में छपी इस स्टडी में पाया गया कि जिन लोगों ने जान गंवाई उनमें से 63% पहले से किसी अन्य बीमारी से ग्रस्त थे। फाइल फोटो


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