बंगाल की राजनीति में हिंसा का इतिहास काफी पुराना है। लेकिन, कुछ महीने बाद होने वाले चुनाव से पहले हिंसा का जो दौर चला है, वह तृणमूल कांग्रेस के तिनके को मूल से उखाड़ सकता है। ममता बनर्जी चुनाव जीतें या हारें, उसके पहले ही उनकी सरकार को भंग करने की नौबत भी आ सकती है। यह संभावना अभी इसलिए प्रबल हो गई है, क्योंकि भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के काफिले पर तृणमूल कार्यकर्ताओं ने जमकर हमला बोल दिया था।

नड्डा के काफिले में जा रही कारों पर भी काफी पत्थर-वर्षा हुई। भाजपा के महासचिव और बंगाल के प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय की कार बुलेटप्रूफ नहीं थी, इसलिए उसके शीशे टूट गए और उन्हें काफी चोटें लगीं। आठ लोगों को अस्पताल में भर्ती किया गया। इस घटना की कड़ी भर्त्सना करने की बजाय मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसे भाजपा की नौटंकी कह डाला। क्या उन्हें पता नहीं है कि यदि एक अखिल भारतीय पार्टी के अध्यक्ष या महासचिव को कुछ हो जाता, तो क्या उनकी सरकार बच पाती? पूरा देश उनके खिलाफ उमड़ पड़ता।

इसका अर्थ यह नहीं कि डायमंड हार्बर के इलाके में भाजपा-काफिले पर जो हमला हुआ, वह ममता बनर्जी ने करवाया होगा। लेकिन, वह हमला हुआ है उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी के संसदीय क्षेत्र में। बंगाल की सरकार यूं भी बुआ-भतीजा सरकार के नाम से जानी जाती है। भाजपा के काफिले की सुरक्षा के लिए तीन बड़े पुलिस अधिकारियों के अलावा दर्जनों जवान तैनात थे, लेकिन वे खीसें निपोरते रहे और तृणमूल कार्यकर्ता पत्थर बरसाते रहे। हमले पर जब देश में हल्ला मचा तो पुलिस ने ट्वीट किया कि ‘खास कुछ हुआ नहीं।’ कुछ लोगों ने पत्थर जरूर फेंके, लेकिन ‘सभी लोग सुरक्षित हैं।’

जरा सोचें कि बंगाल के पुलिसवाले इतना लापरवाह रवैया क्यों अपनाए हुए हैं? यह ठीक है कि जो ट्वीट उन्होंने किया है, उसके लिए उन्हें सरकार ने आदेश नहीं दिया होगा। लेकिन, वे आंख मींचकर ममता सरकार के इशारों पर क्यों थिरक रहे हैं? क्योंकि, वे जानते हैं कि यह सरकार इस तरह के राजनीतिक हमलों और उनसे होनेवाली हत्याओं की अनदेखी करती रहती है। इस गंभीर घटना के बाद के दो दिनों में भाजपा के दो कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है।

बंगाल में 2018 के पंचायत चुनावों में दो दर्जन हत्याएं हुई थीं। विरोधियों की हत्याओं के दम पर तृणमूल के दर्जनों उम्मीदवार निर्विरोध ही चुन लिए गए थे। मरने वालों में कांग्रेस और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता भी थे। खुद तृणमूल कांग्रेस भी कम्युनिस्ट-राज में ऐसी हत्याओं की शिकार हुई थी। कांग्रेस-राज में कम्युनिस्टों ने भी हिंसा का दौर देखा है।

जिन्ना के आह्वान पर 1946 में भारत विभाजन के नाम पर 4000 लोगों का खून बहा था। पिछले दो साल में भाजपा के लगभग सवा सौ कार्यकर्ता मारे गए हैं, जिनमें एक विधायक भी है। क्या ममता यह नहीं सोचतीं कि ये राजनीतिक हत्याएं उनकी छवि को चौपट करके रख देंगी? यदि अपनी सत्ता और उसके भविष्य के प्रति उनका विश्वास सुदृढ़ है तो फिर वे एक जिम्मेदार लोकतांत्रिक नेता के तौर पर इस हिंसा की निंदा क्यों नहीं करतीं?

मुझे ऐसा लगता है कि 2019 के लोकसभा चुनाव-परिणामों से ममता काफी हिल गई हैं। हिंदी क्षेत्र की पार्टी भाजपा को बंगाल में 18 सीटें मिलना किसी छोटे-मोटे भूकंप से कम नहीं है। मध्यप्रदेश के एक गैर-बंगाली भाजपा के प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय ने ममता दीदी का दम फुला दिया है। तृणमूल कांग्रेस के कई जनाधारी नेता टूट-टूटकर भाजपा में जा रहे हैं।

बंगाल में भाजपा 75 लाख नौजवानों को ‘चाकरी प्रतिश्रुति कार्ड’ बांट रही है। नए रोजगारों के साथ भाजपा बंगाल में असल परिवर्तन का नारा दे रही है। जबकि ममता ने कम्युनिस्ट राज के खिलाफ ‘परिवर्तन’ का नारा दिया था। कैलाश विजयवर्गीय ने ‘नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर’ को बंगाल में लागू नहीं करने की भी घोषणा कर दी है। इसका फायदा भाजपा को मतुआ संप्रदाय और अनुसूचितों-जनजातियों के करीब 2 करोड़ लोगों के समर्थन के तौर पर मिलेगा।

इसके अलावा बंगाल के 30% मुसलमानों को अपनी तरफ खींचनेवाली ममता यूं भी घबराई हुई हैं। मुसलमान उर्दू की उपेक्षा और बेरोजगारी से नाराज हैं। उन्हें कांग्रेस और कम्युनिस्ट लुभा रहे हैं। इधर भाजपा की तरह तृणमूल भी हिंदू देवी-देवताओं और संन्यासियों की आरतियां उतारने में लगी हुई है। भाजपा इसे ढोंग कहकर प्रचारित कर रही है। ऐसे में ममता का अस्थिरचित्त हो जाना स्वाभाविक है। लेकिन, ममता बनर्जी भारत की महिला नेताओं में अपने ढंग की विलक्षण नेता हैं, बल्कि अनुपम हैं। उन्हें अपदस्थ करना आसान नहीं है। लेकिन, अगर बंगाल में ध्रुवीकरण की राजनीति चल पड़ी तो बंगाल में पहली बार डाॅ. श्यामप्रसाद मुखर्जी के शिष्यों का राज कायम हो जाएगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)



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डॉ. वेदप्रताप वैदिक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष


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