औरतें कुदरती तौर पर जजमेंटल होती हैं, लेकिन जज नहीं हो सकतीं। ये हम नहीं, हमारे यहां का अदालती चलन कहता है। सुप्रीम कोर्ट में 32 पुरुष जजों के बीच सिर्फ 2 महिला जज हैं। दिल्ली हाई कोर्ट में 229 मर्दों के बीच 8 महिला हैं। मुंबई और दूसरे महानगरों के हाल भी कमोबेश यही हैं। फेहरिस्त लंबी है।

अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने माना कि महिला अधिकारों के लिए रास्ता अभी काफी संकरा-पथरीला है। ये बात उन्होंने उस मामले में कही, जहां मध्यप्रदेश हाई कोर्ट के पुरुष जज ने रेप के दोषी को पीड़िता से राखी बंधवाने की सजा दी।

इसके बाद कोर्ट को ख्याल आया कि यौन शोषण जैसे मामलों के लिए महिला जज होतीं तो बढ़िया होता। यानी रेप जैसे मुद्दे रसोई या रस्मों की तरह 'औरतों का डिपार्टमेंट' हैं। भई, सही बात भी है। जब ज्यादातर पुरुष यौन शोषण के मामलों में शोषक की भूमिका में होते हैं तो वे पारदर्शी फैसला भला कैसे कर सकेंगे।

बहरहाल, जिस भी वजह से सही, अदालत में अदृश्य महिला जजों पर बात शुरू हुई। सवाल उठने लगे कि लॉ कालेज से टॉप कर चुकी लड़कियां आखिर कहां खप जाती हैं? दरअसल पढ़ते हुए ही उन्हें अहसास हो जाता है कि पढ़ाई में अव्वल होना और बात है, कोर्ट में अपराधियों के खिलाफ फैसला दूसरी बात। कोई तेजाब फेंक देगा। कोई परिवार को उठा लेगा। या ये भी न हुआ तो पांत की पांत मर्द जज रोज आपको घूरेंगे, तौलेंगे। और जज बन भी गई तो क्या? कौन सा सुप्रीम कोर्ट की चीफ जज हो जाओगी।

लड़कियां फैसले पर हामी भरने के लिए होती हैं, फैसला सुनाने के लिए नहीं। सुनते-सुनते आखिरकार लड़कियां खुद पीछे हट जाती हैं। ठीक भी है। सदियों से आखिरी और कानूनी बात किसी मर्द की ही रही। फिर चाहे विक्रमादित्य का सिंहासन हो या फिर अरब मुल्क की तख्त-ए-शाही।

ऊंची कुर्सी पर हथौड़े की ठुक-ठुक पर सबको चुप कराते जज आखिर औरत हों भी तो कैसे! सब कुछ तो औरत की बुनियादी तासीर के खिलाफ है। औरत- जो ऊंची आवाज में बात नहीं करती। औरत- जो मर्दों की जिरह में गूंगी हो जाती है। औरत- जो अपराधी को देखते ही थरथरा उठे। औरत- जो फुसफुसा तो सकती है लेकिन फैसला नहीं कर सकती।

ऐसे में औरत लड़ती-भिड़ती कोर्ट रूम तक पहुंच भी जाए तो जज या वकील नहीं रहती, होती है तो केवल औरत। सुप्रीम कोर्ट की बेहद तेज-तर्रार वकील इंदिरा जयसिंह ने एक इंटरव्यू के दौरान बताया था कि कैसे मर्द सहकर्मी उन्हें 'वो औरत' पुकारा करते, जबकि इंदिरा अपने पुरुष सहकर्मियों को 'मेरे काबिल साथी' बुलातीं।

मद्रास हाईकोर्ट में एक मामला दबते-दबाते भी उछल आया था, जब एक नामी-गिरामी जज ने एक महिला वकील के हेयर स्टाइल पर टिप्पणी कर दी थी। जज ने हल्के-फुल्के अंदाज की आड़ में कह दिया था कि फलां की हेयर स्टाइल उनकी जिरह से कहीं ज्यादा खूबसूरत है। जज का जिगरा देखें कि उन्होंने ये बात वकील के सामने ही कही। वकील के भड़कने पर साथी वकीलों ने उल्टे उन्हें ही माफी मांगने को कहा।

औरतों के फैसला देने के हुनर के खिलाफ मनोविज्ञान भी सांठगांठ कर चुका। वो दावा करता है कि औरतें दिमाग की बजाए दिल से फैसला देती हैं। ऐसे में वे किसी खूंखार अपराधी के आंसुओं या दलील पर मोम बन सकती हैं और उस छूट दे सकती हैं। या इसके उलट बिना सोचे किसी मासूम को मुजरिम करार दे सकती हैं। कुल मिलाकर वे भावुकता में फैसला लेती हैं, जो दुनिया के लिए बेहद खौफनाक है।

आज से कई दशक पहले औरतों के डॉक्टर बनने के बारे में भी यही दलील दी गई। औरतों का दिल कमजोर होता है। वे मरीज की हालत देख डर जाएंगी और सर्जरी के दौरान नश्तर यहां का वहां चुभो देंगी। लेकिन ये तर्क करते हुए मर्द बिरादरी भूल गई कि सर्जरी टेबल पर नश्तर-कैंची देने का काम नर्स ही करती है। जब वो तब बेहोश नहीं होती, तो सर्जरी करते हुए क्यों होगी! लेकिन वो भी अस्पताल पहुंची और सफेद कोट पहनकर उनके हाथ भी फौलाद हो जाते हैं।

कहानी आगे बढ़ती है और कोर्टरूम से अस्पताल का गलियारा फर्लांगते हुए पहुंचती है सिलिकॉन वेली यानी IT सेक्टर का हब। देश में सबसे अमीर महिलाओं की लिस्ट खूब चर्चा में है। वजह उनकी अमीरी नहीं, बल्कि उनका ऑफबीट होना है। लिस्ट में टॉप पर हैं रोशनी नाडर, जो IT कंपनी की सीईओ हैं। मर्दानी सोच वाली आंखें हैरत से चौकोर हुई पड़ी हैं कि फैशन या मेडिसिन में रहने वाली औरत IT में कैसे टिक गई।

सिलिकॉन वैली तक में गिनती की औरतें हैं। IT कंपनियों का मानना है कि औरतों की दिलचस्पी इंसानों और वाकयों में होती है। वे HR तक तो ठीक हैं लेकिन कोडिंग में कतई नहीं। यहां तक कि इसके लिए उनकी 'जैविक संचरना' को जिम्मेदार ठहरा दिया गया। औरत के अंदरुनी हिस्से की- दिमाग की बुनावट ऐसी है, जो कोडिंग को 'सूट' नहीं करती।

ओह, लेकिन ये क्या! औरत ने यहां भी खुद को साबित कर दिया। रोशनी नाडर ने बता दिया कि कंप्यूटर पर सिर झुकाए और आंखें गड़ाए बैठने वाले मर्द ही नहीं, औरतों को भी एलियन भाषा लिखनी आती है। महिला जजों के मामले में हम अब भी पीछे हैं। लेकिन एक उम्मीद बाकी है।

जज की टेबल पर रखी वो मूर्ति, जिसकी आंखों पर पट्टी होने के बाद भी एक हाथ में तलवार और दूसरे में तराजू है। ये कानून की देवी की मूरत है, जिसे हजारों सालों से इजिप्ट में पूजा जाता रहा और जो वहां से होते हुए दुनियाभर के फैसलापसंदों की टेबल पर विराज गई।

जब खुद कानून देवी की शक्ल में है तो कानून बनाने या फैसला देने वाले अकेले मर्द क्यों रहें! चलिए, घर से शुरुआत करते हैं। नई बाछी खरीदने से लेकर जमीन के बंटवारे तक में आंचल की ओट से सिर्फ देखें नहीं, बोलें. जो न्यायसंगत लगे, बस बोल डालें।

डॉक्टरों के घर से हैं और नाचना पसंद है तो नाचें। आर्ट लेने को कहा जाए और दिल गणित में रमे तो वही पढ़ें। और अदालती जिरह लुभाए, तो बस सीना फुलाकर एलान कर दें कि देश की पहली महिला चीफ जस्टिस आप या आप में से ही कोई एक बनेगी।



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When the law itself is in the shape of a goddess, why be the only men who make laws or give decisions?


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